न जा तू कि जाती है मेरी जां तेरे जाने से
गिर-गिर संभलती है मेरी जां तेरे जाने से
न जा तू कि जाती है मेरी जां तेरे जाने से
हमसे हुई खता खड़े हम गुनहगार बनकर
सज़ा जो भी मिले, है आसां, तेरे जाने से
रखते थे उदासियाँ जो चेहरों पे कल तलक
हँस रहे मेरे रकीब सुब्ह-शाम तेरे जाने से
इक आरजू दबी थी बरसों से जो दिल में
धुआं बनकर हो गयी तमाम तेरे जाने से
किस्से जो चल रहे थे सरगोशियों के बूते
हरसू हो गए चर्चा-ए-आम तेरे जाने से
न रहा यकीं मुझे खुद अपनी जबान का
यूँ जबां मेरी हो गयी बद्जबां तेरे जाने से
देते हैं अब भी जुगनू इन दरों पे दस्तक
देते हैं अब भी जुगनू इन दरों पे दस्तक
अब भी मेरे घर कुछ परिंदे रोज आते हैं
एक आहट से खुल जाती हैं आँखें मेरी
मदहोशी के चंद आलम रोज आते हैं
ये बेबसी चुभती है नश्तरों सी दिल में
निगाहों में जख्मो के लहू रोज आते हैं
रहा न कोई अपना इन गलियों में बाकी
फिर किसे देखने यहाँ हम रोज आते हैं
कुछ लोग जो नहीं रहे अब इस जहान में
मेरे ख्वाबों में मुझसे मिलने रोज आते हैं
है इंतज़ार जिन्हें, मेरी बर्बादी का ‘कोमल’
वही मेरी खैरियत लेने यहाँ रोज आते हैं.
तू नहीं, तेरी यादों के सिवा कुछ भी नहीं
तू नहीं, तेरी यादों के सिवा कुछ भी नहीं
दिल में भी तेरी बातों के सिवा कुछ भी नहीं
मेरे हाथों की इन लकीरों में अब ‘किसलय’
खामोश स्याह रातों के सिवा कुछ भी नहीं
इल्म हुआ भी हमें, तो आखरी लम्हात ये
जिन्दगी मुलाकातों के सिवा कुछ भी नहीं
ज़माने से है रुकी इक बूँद जो इन पलकों पे
दम तोड़ती हसरतों के सिवा कुछ भी नहीं
खुदा पूछेगा, किया क्या हमने, हम कहेंगे क्या
किया जो कुछ भी, बातों के सिवा कुछ भी नहीं
जिन दरख्तों पे होते थे कभी परींदे काबिज़
आज चंद सूखे पत्तों के सिवा कुछ भी नहीं
बनते थे नक्शे जहाँ, उस बेदाग़ चेहरे के
निगाहों में बरसातों के सिवा कुछ भी नहीं
जमीं नहीं आसमां नहीं, दौलत नहीं मकां भी नहीं
दिल क्या चाहे, तेरी कुरवतों के सिवा कुछ भी नहीं
जिस्म मेरा जिन्दा नहीं और अभी फना भी नहीं
गाहे-बगाहे, इसमें हरकतों के सिवा कुछ भी नहीं
रोके भला कोई कैसे दिल को उस तक जाने से
समझाना इसे, बगावतों के सिवा कुछ भी नहीं
किस से लें अब ‘कोमल’, बेगुनाही का सबूत हम
मेरी गुनाही, मेरी चाहतों के सिवा कुछ भी नहीं
तू नहीं, तेरी उम्मीद नहीं, न मातम तेरे जाने का
जेहन में अब तेरी इबादतों के सिवा कुछ भी नहीं
तू नहीं, तेरी यादों के सिवा कुछ भी नहीं
दिल में भी तेरी बातों के सिवा कुछ भी नहीं
उपवास की ताकत
बहुत सालों पहले जब मैं एक छोटा सा बच्चा हुआ करता था, लोगों को और अपने घर के कुछ सदस्यों को पर्व त्योहारों पर उपवास करते देखता था तो मुझे समझ नहीं आता था कि आखिर ये ऐसा क्यूँ करते हैं? खुद के स्वास्थय के लिए, देश के भूखे लोगों को खाना मिल सके इसलिए या फिर इसलिए कि भगवान् खुश होकर मन की मुरादें पूरी करेंगे| इसका जवाब मुझे उस वक़्त नहीं मिला और न ही मैं इतनी सारी जटिलताएं समझने का सामर्थ्य ही रखता था मगर सबके साथ मैंने भी जन्माष्टमी के दिन उपवास रखना शुरू कर दिया था और वो दिन अब भी मेरे दिमाग में बिलकुल तरो ताजा हैं | दिन भर के उपवास से मन की शुद्धि होती थी और उसके बाद भगवान् की पूजा| दिल से कुछ माँगना चाहे खुद के लिए चाहे औरों के लिए, एक मौका होता था जब सारी चिंताएँ भूलकर दिल को टटोलते थे कि हम में क्या क्या बुराईयाँ हैं और हम उसे कैसे दूर कर सकते हैं| सच्चे दिल से की गयी प्रार्थना कभी न कभी जरूर पूरी होती है| आज जिन्दगी के इस देहलीज पर आकर जब उन दिनों की तरफ घूम कर एक निगाह डालता हूँ तो लगता है मुझे मेरा जवाब मिल गया. २२ अगस्त २००९,तीज का पर्व, विवाहित स्त्रियों के लिए बहुत ही पावन दिन होता है| इस दिन वो अपने पति की लम्बी उम्र के लिए उपवास रखती हैं और अन्न जल बिलकुल ग्रहण नहीं करतीं| मैं न तो औरत हूँ न ही शादीशुदा मगर बरसों बाद आज फिर से मैंने उपवास रखा और मैंने आज फिर से अपने दिल को टटोला मैंने| आज फिर मैंने भगवान् से सच्चे दिल से कुछ माँगा| शादी एक रिवाज है रिश्ते को समाज में एक नाम देने का, मगर दिल से जुड़े रिश्तों का कोई नाम नहीं होता उसे मैं भगवान् का नाम देता हूँ| मैंने आज अपने उसी दिल से किसी के लिए उपवास रखा जिस से मेरा रिश्ता भगवान् ने दिल का बनाकर भेजा है| भगवान् से उसकी लम्बी उम्र और जीवन में सफलता की प्रार्थना की. मुझे पूरा भरोसा है भगवान् मेरी प्रार्थना जरूर सुनेंगे. उपवास की ताकत का अंदाजा मुझे हो गया है और ये भी अनुभव हुआ कि वो हमेशा मेरे इर्द गिर्द ही कहीं है और मैं अकेला नहीं. आज नहीं तो कल मेरी आँखें भी दिल की इस बात का यकीन करेंगी.
कि अब तो पीना है ज़हर ताउम्र ये

कि अब ‘किसलय’, सफ़र ही कितना बाकी है
हुए इश्क में फ़ना, कई दीवाने यहाँ ‘कोमल’
चलो देखें, हौसला मुझमें कितना बाकी है
चश्म-ए-तर जो हुए, फिक्र उसकी नहीं
बेजान जिस्म में, लहू कितना बाकी है
नफ़रतों की आँधी जो रुके, तो देखेंगे हम
किस दिल में, अब ख़ुदा, कितना बाकी है
हर दीवार तोड़, जब आये उसकी आगोश में
तो जाना, अभी फ़ासला कितना बाकी है
ख़्वाब देखना कभी, तो याद रखना इक बात
कि बिखर जाएँ, तो समेटना कितना बाकी है
कि अब तो पूछने लगी है, सबा भी मुझसे
उसकी खुशबू लाना, और कितना बाकी है
इस तारीकी में, मालूम होता नहीं जिस्म को
इस दिल से दूर जाना, अभी कितना बाकी है
