न जा तू कि जाती है मेरी जां तेरे जाने से
गिर-गिर संभलती है मेरी जां तेरे जाने से
न जा तू कि जाती है मेरी जां तेरे जाने से
हमसे हुई खता खड़े हम गुनहगार बनकर
सज़ा जो भी मिले, है आसां, तेरे जाने से
रखते थे उदासियाँ जो चेहरों पे कल तलक
हँस रहे मेरे रकीब सुब्ह-शाम तेरे जाने से
इक आरजू दबी थी बरसों से जो दिल में
धुआं बनकर हो गयी तमाम तेरे जाने से
किस्से जो चल रहे थे सरगोशियों के बूते
हरसू हो गए चर्चा-ए-आम तेरे जाने से
न रहा यकीं मुझे खुद अपनी जबान का
यूँ जबां मेरी हो गयी बद्जबां तेरे जाने से
न कहो कुछ न करो उम्मीद मुझसे
न कहो कुछ न करो उम्मीद मुझसे
भरोसे अक्सर टूट जाया करते हैं
जिन दीवारों में मोहब्बत की ईंटें न हो
घरौंदे अक्सर टूट जाया करते हैं
करते हें जिनसे बेपनाह मोहब्बत हम
रिश्ते अक्सर टूट जाया करते हैं
रखते हैं चेहरे पे हँसी जो सर-ए-राह
अकेले अक्सर टूट जाया करते हें
जिनके टूटने का ग़म हो सबसे ज्यादा
सपने अक्सर टूट जाया करते हैं
भर लो अपनी आगोश में हमें फिर से
बिन तेरे अक्सर टूट जाया करते हें
देते हैं अब भी जुगनू इन दरों पे दस्तक
देते हैं अब भी जुगनू इन दरों पे दस्तक
अब भी मेरे घर कुछ परिंदे रोज आते हैं
एक आहट से खुल जाती हैं आँखें मेरी
मदहोशी के चंद आलम रोज आते हैं
ये बेबसी चुभती है नश्तरों सी दिल में
निगाहों में जख्मो के लहू रोज आते हैं
रहा न कोई अपना इन गलियों में बाकी
फिर किसे देखने यहाँ हम रोज आते हैं
कुछ लोग जो नहीं रहे अब इस जहान में
मेरे ख्वाबों में मुझसे मिलने रोज आते हैं
है इंतज़ार जिन्हें, मेरी बर्बादी का ‘कोमल’
वही मेरी खैरियत लेने यहाँ रोज आते हैं.
बीती रात कुछ लोग मेरे घर आये थे
बीती रात कुछ लोग मेरे घर आये थे
साथ प्यार और जज़बात भी लाये थे||
होते थे कभी जो मेरे वतन का हिस्सा
हमसे मिलने पराये मुल्क से आये थे||
शक्ल-ओ-सूरत थे बिलकुल मेरे जैसे
गोया हमसे ही बिछडे हमसाये थे||
न कहा किसी ने कुछ न ही पूछा मुझसे
जाने किस मकसद से यहाँ आये थे||
गोलियों की आवाजों पे ख्याल आया हमें
खुदा जाने आतंकी थे या खौफज़दा साये थे||
सरहदें तो खेंच दीं हैवानों ने जमीन पर
मगर इंसानों के दिल कहाँ बाँट पाए थे||
तू नहीं, तेरी यादों के सिवा कुछ भी नहीं
तू नहीं, तेरी यादों के सिवा कुछ भी नहीं
दिल में भी तेरी बातों के सिवा कुछ भी नहीं
मेरे हाथों की इन लकीरों में अब ‘किसलय’
खामोश स्याह रातों के सिवा कुछ भी नहीं
इल्म हुआ भी हमें, तो आखरी लम्हात ये
जिन्दगी मुलाकातों के सिवा कुछ भी नहीं
ज़माने से है रुकी इक बूँद जो इन पलकों पे
दम तोड़ती हसरतों के सिवा कुछ भी नहीं
खुदा पूछेगा, किया क्या हमने, हम कहेंगे क्या
किया जो कुछ भी, बातों के सिवा कुछ भी नहीं
जिन दरख्तों पे होते थे कभी परींदे काबिज़
आज चंद सूखे पत्तों के सिवा कुछ भी नहीं
बनते थे नक्शे जहाँ, उस बेदाग़ चेहरे के
निगाहों में बरसातों के सिवा कुछ भी नहीं
जमीं नहीं आसमां नहीं, दौलत नहीं मकां भी नहीं
दिल क्या चाहे, तेरी कुरवतों के सिवा कुछ भी नहीं
जिस्म मेरा जिन्दा नहीं और अभी फना भी नहीं
गाहे-बगाहे, इसमें हरकतों के सिवा कुछ भी नहीं
रोके भला कोई कैसे दिल को उस तक जाने से
समझाना इसे, बगावतों के सिवा कुछ भी नहीं
किस से लें अब ‘कोमल’, बेगुनाही का सबूत हम
मेरी गुनाही, मेरी चाहतों के सिवा कुछ भी नहीं
तू नहीं, तेरी उम्मीद नहीं, न मातम तेरे जाने का
जेहन में अब तेरी इबादतों के सिवा कुछ भी नहीं
तू नहीं, तेरी यादों के सिवा कुछ भी नहीं
दिल में भी तेरी बातों के सिवा कुछ भी नहीं
