न कहो कुछ न करो उम्मीद मुझसे
न कहो कुछ न करो उम्मीद मुझसे
भरोसे अक्सर टूट जाया करते हैं
जिन दीवारों में मोहब्बत की ईंटें न हो
घरौंदे अक्सर टूट जाया करते हैं
करते हें जिनसे बेपनाह मोहब्बत हम
रिश्ते अक्सर टूट जाया करते हैं
रखते हैं चेहरे पे हँसी जो सर-ए-राह
अकेले अक्सर टूट जाया करते हें
जिनके टूटने का ग़म हो सबसे ज्यादा
सपने अक्सर टूट जाया करते हैं
भर लो अपनी आगोश में हमें फिर से
बिन तेरे अक्सर टूट जाया करते हें
देते हैं अब भी जुगनू इन दरों पे दस्तक
देते हैं अब भी जुगनू इन दरों पे दस्तक
अब भी मेरे घर कुछ परिंदे रोज आते हैं
एक आहट से खुल जाती हैं आँखें मेरी
मदहोशी के चंद आलम रोज आते हैं
ये बेबसी चुभती है नश्तरों सी दिल में
निगाहों में जख्मो के लहू रोज आते हैं
रहा न कोई अपना इन गलियों में बाकी
फिर किसे देखने यहाँ हम रोज आते हैं
कुछ लोग जो नहीं रहे अब इस जहान में
मेरे ख्वाबों में मुझसे मिलने रोज आते हैं
है इंतज़ार जिन्हें, मेरी बर्बादी का ‘कोमल’
वही मेरी खैरियत लेने यहाँ रोज आते हैं.
बीती रात कुछ लोग मेरे घर आये थे
बीती रात कुछ लोग मेरे घर आये थे
साथ प्यार और जज़बात भी लाये थे||
होते थे कभी जो मेरे वतन का हिस्सा
हमसे मिलने पराये मुल्क से आये थे||
शक्ल-ओ-सूरत थे बिलकुल मेरे जैसे
गोया हमसे ही बिछडे हमसाये थे||
न कहा किसी ने कुछ न ही पूछा मुझसे
जाने किस मकसद से यहाँ आये थे||
गोलियों की आवाजों पे ख्याल आया हमें
खुदा जाने आतंकी थे या खौफज़दा साये थे||
सरहदें तो खेंच दीं हैवानों ने जमीन पर
मगर इंसानों के दिल कहाँ बाँट पाए थे||
तू नहीं, तेरी यादों के सिवा कुछ भी नहीं
तू नहीं, तेरी यादों के सिवा कुछ भी नहीं
दिल में भी तेरी बातों के सिवा कुछ भी नहीं
मेरे हाथों की इन लकीरों में अब ‘किसलय’
खामोश स्याह रातों के सिवा कुछ भी नहीं
इल्म हुआ भी हमें, तो आखरी लम्हात ये
जिन्दगी मुलाकातों के सिवा कुछ भी नहीं
ज़माने से है रुकी इक बूँद जो इन पलकों पे
दम तोड़ती हसरतों के सिवा कुछ भी नहीं
खुदा पूछेगा, किया क्या हमने, हम कहेंगे क्या
किया जो कुछ भी, बातों के सिवा कुछ भी नहीं
जिन दरख्तों पे होते थे कभी परींदे काबिज़
आज चंद सूखे पत्तों के सिवा कुछ भी नहीं
बनते थे नक्शे जहाँ, उस बेदाग़ चेहरे के
निगाहों में बरसातों के सिवा कुछ भी नहीं
जमीं नहीं आसमां नहीं, दौलत नहीं मकां भी नहीं
दिल क्या चाहे, तेरी कुरवतों के सिवा कुछ भी नहीं
जिस्म मेरा जिन्दा नहीं और अभी फना भी नहीं
गाहे-बगाहे, इसमें हरकतों के सिवा कुछ भी नहीं
रोके भला कोई कैसे दिल को उस तक जाने से
समझाना इसे, बगावतों के सिवा कुछ भी नहीं
किस से लें अब ‘कोमल’, बेगुनाही का सबूत हम
मेरी गुनाही, मेरी चाहतों के सिवा कुछ भी नहीं
तू नहीं, तेरी उम्मीद नहीं, न मातम तेरे जाने का
जेहन में अब तेरी इबादतों के सिवा कुछ भी नहीं
तू नहीं, तेरी यादों के सिवा कुछ भी नहीं
दिल में भी तेरी बातों के सिवा कुछ भी नहीं
श्रधांजलि – उस्ताद रहीम परवाज़ खान
३ सितम्बर २००९, मेरी जिन्दगी का एक अहम् हिस्सा आज मुझसे जुदा हो गया. मेरे गुरूजी उस्ताद रहीम परवाज़ खान इस दुनिया से हमेशा के लिए चले गए. भगवान् उनकी आत्मा को शान्ति दे. कल ही मैं उनके बारे में बातें कर रहा था कि कैसे उन्होंने मुझे इक नयी ज़िंदगी दी थी. कैसे उन्होंने मुझे संगीत के माध्यम से सिखाया था कि कोई भी काम नामुमकिन नहीं होता,बशर्ते दिल में सच्ची लगन हो. मेरी जिन्दगी में उनका आना किसी सपने से कम नहीं था, जिस गुरु की तलाश में मैं १० सालों तक भटका था, वो मुझे किसी के प्यार की बदौलत मिले थे और आज उसी संगीत की बदौलत हर दिन जी रहा था. मेरे गुरूजी न सिर्फ गुरु बल्कि मेरे पिता औ र्मेरे दोस्त सामान थे. गलतियों पर जितना वो डांटते थे उतना प्यार भी करते थे. संगीत की कक्षा के बाद चाय की दूकान पर घंटे भर बैठ कर समोसे और चाय की चुस्कियों के साथ संगीत की बारीकियों पर बातें करना और अपनी जिन्दगी की हर बात आपस में बांटना अब फिर नहीं होगा.
उनसे पहली बार मिलना भी मुझे याद है, कैसे उस भीड़ में भी मैंने उन्हें दूर से ही पहचान लिया था और बिना किसी झिझक के जाते ही मैंने पूछा था आप ही हैं न उस्ताद रहीम परवाज़ खान? आँखें अपनी मंजिल खुद बा खुद पहचान लेती हैं, बस आपको पता होना चाहिए आप क्या तलाश कर रहे हैं.

<-गुरूजी के साथ सकून के कुछ पल !
उन्होंने जो प्यार दिया है उसका कोई मोल नहीं, उनको मेरी शादी में आने की बड़ी ख्वाइश थी, उनको पता था शायद कि अब उनकी जिन्दगी ज्यादा दिनों तक उनका साथ नहीं देगी, इसलिए कुछ दिनों से उन्होंने घर बुलाकर क्लास लेना शुरू कर दिया था, वो हमेशा कहते थे, जितना सीखना है सीख लो, मेरा कोई भरोसा नहीं, कब चला जाऊं, फिर याद करना एक पागल बुड्ढा था कोई.
उनके बहुत करीब और ख़ास शागिर्दों में मैं भी था और उनको मुझसे बहुत उम्मीदें थीं| मैं खुदा का और उस शख्स का शुक्रगुजार हूँ जिनकी वजह से मैं इनसे मिला और मुझे जिन्दगी में ऐसे ख़ास पल उनके साथ गुजरे और ऐसा रिश्ता कायम हुआ जिसमें कोई द्वेष, कोई छल कपट नहीं था, कुछ था अगर तो वो बस संगीत के प्रति दीवानगी और सच्ची कोशिश संगीत की विरासत को एक पीढी से दूसरी पीढी तक सकुशल पहुंचाने की.
गुरूजी आपको मेरी ग़ज़लें अच्छी नहीं लगती थीं, लेकिन फिर भी आपके नाम चंद पंक्तियाँ लिख रहा हूँ, पसंद न आये तो बुरा मत मानियेगा :
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दो सपने देखे थे इन आँखों से हमने ‘कोमल’
एक खुदा ने तोड़ दिया एक मेरी नींद खुल गयी
कल तलक जो दुनिया लगती थी मुझे जन्नत
हाथ छूटते ही तुम्हारा जहन्नम में बदल गयी
मशक्कतों से जुटाई थीं चंद घडियां सकून की
रेत की मानिंद हाथों से चुपचाप फिसल गयी
फिर जी मचल रहा आज गाने बजाने का मेरा
तुम क्या गए, गोया शहर से हर महफिल गयी
तुम दुनिया से गए, और वो शहर से चला गया
हम भटका किये बे-आस, शब् भी निकल गयी
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गुरूजी, आज आप हमारे बीच नहीं हैं, मगर आपने जो बातें सिखाईं है जो ज्ञान हमें दिया है, उसे हमेशा अपने पास बरकरार रखेंगे, आपको अपने आप में जिन्दा रखेंगे, आप जहाँ भी हैं हमें अब भी आपका आर्शीवाद चाहिए, आप सुन रहे हैं न, मैं अब भी आपको सुन सकता हौं, आप हमेशा मेरे साथ हैं.. और खुश हैं .. आप ने बस जाने में थोडी जल्दी कर दी, अभी तो बस सीखना शुरू ही किया था .. मेरी शादी भी बची रह गयी और आपको उस शख्स से भी मिलना था न जिसकी वजह से मैं आपके पास आया था .. आपको मैं अपने घर पे अपने हाथों से बना कर कुछ खिलाने वाला भी था, आपको याद है न? मुझे पता है अब आप नहीं आयेंगे, मगर इन्तजार तो रहेगा, दिल है कि मानता नहीं
खुदा हाफिज़ !!
आपका किसलय
