बीती रात कुछ लोग मेरे घर आये थे
बीती रात कुछ लोग मेरे घर आये थे
साथ प्यार और जज़बात भी लाये थे||
होते थे कभी जो मेरे वतन का हिस्सा
हमसे मिलने पराये मुल्क से आये थे||
शक्ल-ओ-सूरत थे बिलकुल मेरे जैसे
गोया हमसे ही बिछडे हमसाये थे||
न कहा किसी ने कुछ न ही पूछा मुझसे
जाने किस मकसद से यहाँ आये थे||
गोलियों की आवाजों पे ख्याल आया हमें
खुदा जाने आतंकी थे या खौफज़दा साये थे||
सरहदें तो खेंच दीं हैवानों ने जमीन पर
मगर इंसानों के दिल कहाँ बाँट पाए थे||
