Kislay Komal's Blog

देते हैं अब भी जुगनू इन दरों पे दस्तक

देते हैं अब भी जुगनू इन दरों पे दस्तक
अब भी मेरे घर कुछ परिंदे रोज आते हैं

एक आहट से खुल जाती हैं आँखें मेरी
मदहोशी के चंद आलम रोज आते हैं

ये बेबसी चुभती है नश्तरों सी दिल में
निगाहों में जख्मो के लहू रोज आते हैं

रहा न कोई अपना इन गलियों में बाकी
फिर किसे देखने यहाँ हम रोज आते हैं

कुछ लोग जो नहीं रहे अब इस जहान में
मेरे ख्वाबों में मुझसे मिलने रोज आते हैं

है इंतज़ार जिन्हें, मेरी बर्बादी का ‘कोमल’
वही मेरी खैरियत लेने यहाँ रोज आते हैं.

Speak Your Mind

Tell us what you're thinking...
and oh, if you want a pic to show with your comment, go get a gravatar!

Kislay Komal's Blog