Kislay Komal's Blog

तू नहीं, तेरी यादों के सिवा कुछ भी नहीं

तू नहीं, तेरी यादों के सिवा कुछ भी नहीं
दिल में भी तेरी बातों के सिवा कुछ भी नहीं

मेरे हाथों की इन लकीरों में अब ‘किसलय’
खामोश स्याह रातों के सिवा कुछ भी नहीं

इल्म हुआ भी हमें, तो आखरी लम्हात ये
जिन्दगी मुलाकातों के सिवा कुछ भी नहीं

ज़माने से है रुकी इक बूँद जो इन पलकों पे
दम तोड़ती हसरतों के सिवा कुछ भी नहीं

खुदा पूछेगा, किया क्या हमने, हम कहेंगे क्या
किया जो कुछ भी, बातों के सिवा कुछ भी नहीं

जिन दरख्तों पे होते थे कभी परींदे काबिज़
आज चंद सूखे पत्तों के सिवा कुछ भी नहीं

बनते थे नक्शे जहाँ, उस बेदाग़ चेहरे के
निगाहों में बरसातों के सिवा कुछ भी नहीं

जमीं नहीं आसमां नहीं, दौलत नहीं मकां भी नहीं
दिल क्या चाहे, तेरी कुरवतों के सिवा कुछ भी नहीं

जिस्म मेरा जिन्दा नहीं और अभी फना भी नहीं
गाहे-बगाहे, इसमें हरकतों के सिवा कुछ भी नहीं

रोके भला कोई कैसे दिल को उस तक जाने से
समझाना इसे, बगावतों के सिवा कुछ भी नहीं

किस से लें अब ‘कोमल’, बेगुनाही का सबूत हम
मेरी गुनाही, मेरी चाहतों के सिवा कुछ भी नहीं

तू नहीं, तेरी उम्मीद नहीं, न मातम तेरे जाने का
जेहन में अब तेरी इबादतों के सिवा कुछ भी नहीं

तू नहीं, तेरी यादों के सिवा कुछ भी नहीं
दिल में भी तेरी बातों के सिवा कुछ भी नहीं

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