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श्रधांजलि – उस्ताद रहीम परवाज़ खान

३ सितम्बर २००९, मेरी जिन्दगी का एक अहम् हिस्सा आज मुझसे जुदा हो गया. मेरे गुरूजी उस्ताद रहीम परवाज़ खान इस दुनिया से हमेशा के लिए चले गए. भगवान् उनकी आत्मा को शान्ति दे. कल ही मैं उनके बारे में बातें कर रहा था कि कैसे उन्होंने मुझे इक नयी ज़िंदगी दी थी. कैसे उन्होंने मुझे संगीत के माध्यम से सिखाया था कि कोई भी काम नामुमकिन नहीं होता,बशर्ते दिल में सच्ची लगन हो. मेरी जिन्दगी में उनका आना किसी सपने से कम नहीं था, जिस गुरु की तलाश में मैं १० सालों तक भटका था, वो मुझे किसी के प्यार की बदौलत मिले थे और आज उसी संगीत की बदौलत हर दिन जी रहा था. मेरे गुरूजी न सिर्फ गुरु बल्कि मेरे पिता औ र्मेरे दोस्त सामान थे. गलतियों पर जितना वो डांटते थे उतना प्यार भी करते थे. संगीत की कक्षा के बाद चाय की दूकान पर घंटे भर बैठ कर समोसे और चाय की चुस्कियों के साथ संगीत की बारीकियों पर बातें करना और अपनी जिन्दगी की हर बात आपस में बांटना अब फिर नहीं होगा.

उनसे पहली बार मिलना भी मुझे याद है, कैसे उस भीड़ में भी मैंने उन्हें दूर से ही पहचान लिया था और बिना किसी झिझक के जाते ही मैंने पूछा था आप ही हैं न उस्ताद रहीम परवाज़ खान? आँखें अपनी मंजिल खुद बा खुद पहचान लेती हैं, बस आपको पता होना चाहिए आप क्या तलाश कर रहे हैं.

<-गुरूजी के साथ सकून के कुछ पल !

उन्होंने जो प्यार दिया है उसका कोई मोल नहीं, उनको मेरी शादी में आने की बड़ी ख्वाइश थी, उनको पता था शायद कि अब उनकी जिन्दगी ज्यादा दिनों तक उनका साथ नहीं देगी, इसलिए कुछ दिनों से उन्होंने घर बुलाकर क्लास लेना शुरू कर दिया था, वो हमेशा कहते थे, जितना सीखना है सीख लो, मेरा कोई भरोसा नहीं, कब चला जाऊं, फिर याद करना एक पागल बुड्ढा था कोई.

उनके बहुत करीब और ख़ास शागिर्दों में मैं भी था और उनको मुझसे बहुत उम्मीदें थीं| मैं खुदा का और उस शख्स का शुक्रगुजार हूँ जिनकी वजह से मैं इनसे मिला और मुझे जिन्दगी में ऐसे ख़ास पल उनके साथ गुजरे और ऐसा रिश्ता कायम हुआ जिसमें कोई द्वेष, कोई छल कपट नहीं था, कुछ था अगर तो वो बस संगीत के प्रति दीवानगी और सच्ची कोशिश संगीत की विरासत को एक पीढी से दूसरी पीढी तक सकुशल पहुंचाने की.

गुरूजी आपको मेरी ग़ज़लें अच्छी नहीं लगती थीं, लेकिन फिर भी आपके नाम चंद पंक्तियाँ लिख रहा हूँ, पसंद न आये तो बुरा मत मानियेगा :

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दो सपने देखे थे इन आँखों से हमने ‘कोमल’
एक खुदा ने तोड़ दिया एक मेरी नींद खुल गयी

कल तलक जो दुनिया लगती थी मुझे जन्नत
हाथ छूटते ही तुम्हारा जहन्नम में बदल गयी

मशक्कतों से  जुटाई थीं चंद घडियां सकून की
रेत की मानिंद हाथों से चुपचाप फिसल गयी

फिर जी मचल रहा आज गाने बजाने का मेरा
तुम क्या गए, गोया शहर से हर महफिल गयी

तुम दुनिया से गए, और वो शहर से चला गया
हम भटका किये बे-आस, शब् भी निकल गयी

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गुरूजी, आज आप हमारे बीच नहीं हैं, मगर आपने जो बातें सिखाईं है जो ज्ञान हमें दिया है, उसे हमेशा अपने पास बरकरार रखेंगे, आपको अपने आप में जिन्दा रखेंगे, आप जहाँ भी हैं हमें अब भी आपका आर्शीवाद चाहिए, आप सुन रहे हैं न, मैं अब भी आपको सुन सकता हौं, आप हमेशा मेरे साथ हैं.. और खुश हैं .. आप ने बस जाने में थोडी जल्दी कर दी, अभी तो बस सीखना शुरू ही किया था .. मेरी शादी भी बची रह गयी और आपको उस शख्स से भी मिलना था न जिसकी वजह से मैं आपके पास आया था .. आपको मैं अपने घर पे अपने हाथों से बना कर कुछ खिलाने वाला भी था, आपको याद है न? मुझे पता है अब आप नहीं आयेंगे, मगर इन्तजार तो रहेगा, दिल है कि मानता नहीं :)

खुदा हाफिज़ !!
आपका किसलय

Comments

One Response to “श्रधांजलि – उस्ताद रहीम परवाज़ खान”
  1. Did you go to sir’s Antimakriya. I was not having so much courage to come. :(

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