Kislay Komal's Blog

संघर्ष

मुझे पक्का यकीन हो गया कि भगवान् मेरा हमेशा साथ देते हैं. साथ देने का तात्पर्य मेरा यह नहीं कि मैं जो करता हूँ उसमें सफल हो जाता हूँ, मेरा कहने का अर्थ यह है कि जब भी मैं खुद के लिए कुछ करता हूँ, मुझे उसमें सफलता नहीं मिलती, जब भी मैं दूसरों के लिए कुछ मांगता हूँ मेरी वो मांग झट पूरी हो जाती है, और जब भी मैं कोई गलत काम करता हूँ, उसका परिणाम मुझे तुंरत एक सजा के रूप में मिल जाता है| भगवान् आप बस ऐसे ही मेरा साथ देते रहना मुझे अपनी जिन्दगी में कुछ भी नहीं चाहिए, लेकिन जब भी कुछ माँगूँ आपसे औरों के लिए वो जरूर पूरा करना हमेशा की तरह.पिछले कुछ महीनों में मैंने सब कुछ खो दिया आज मेरे पास न तो पैसा है, न तो प्यार है, न तो गुरु है न ही संस्कार है. मेरे हाथ खाली हैं और मैं वो बदनसीब हूँ जिसकी आह पर भी लोगों को लगता है, शायद ये कोई नया नाटक होगा. मैं वो हूँ जिसके साथ चलने में लोगों को शर्म आये. मुझे नहीं मालूम लोग कितने अच्छे और कितने बुरे हैं. मुझे बस इतना पता है मैं खुद की नजरों में गिरा हूँ, और बस उठने की कोशिश कर रहा हूँ. जब उठ जाऊँ तो एक बार आपके पास आऊंगा, आप मुझे अपनाओगे? सच की जीत होती है ये भरोसा दिलाओगे ?

न जा तू कि जाती है मेरी जां तेरे जाने से

गिर-गिर संभलती है मेरी जां तेरे जाने से
न जा तू कि जाती है मेरी जां तेरे जाने से

हमसे हुई खता खड़े हम गुनहगार बनकर
सज़ा जो भी मिले, है आसां, तेरे जाने से

रखते थे उदासियाँ जो चेहरों पे कल तलक
हँस रहे मेरे रकीब सुब्ह-शाम तेरे जाने से

इक आरजू दबी थी बरसों से जो दिल में
धुआं बनकर हो गयी तमाम तेरे जाने से

किस्से जो चल रहे थे सरगोशियों के बूते
हरसू हो गए चर्चा-ए-आम तेरे जाने से

न रहा यकीं मुझे खुद अपनी जबान का
यूँ जबां मेरी हो गयी बद्जबां तेरे जाने से

न कहो कुछ न करो उम्मीद मुझसे

न कहो कुछ न करो उम्मीद मुझसे
भरोसे अक्सर टूट जाया करते हैं

जिन दीवारों में मोहब्बत की ईंटें न हो
घरौंदे अक्सर टूट जाया करते हैं

करते हें जिनसे बेपनाह मोहब्बत हम
रिश्ते अक्सर टूट जाया करते हैं

रखते हैं चेहरे पे हँसी जो सर-ए-राह
अकेले अक्सर टूट जाया करते हें

जिनके टूटने का ग़म हो सबसे ज्यादा
सपने अक्सर टूट जाया करते हैं

भर लो अपनी आगोश में हमें फिर से
बिन तेरे अक्सर टूट जाया करते हें

देते हैं अब भी जुगनू इन दरों पे दस्तक

देते हैं अब भी जुगनू इन दरों पे दस्तक
अब भी मेरे घर कुछ परिंदे रोज आते हैं

एक आहट से खुल जाती हैं आँखें मेरी
मदहोशी के चंद आलम रोज आते हैं

ये बेबसी चुभती है नश्तरों सी दिल में
निगाहों में जख्मो के लहू रोज आते हैं

रहा न कोई अपना इन गलियों में बाकी
फिर किसे देखने यहाँ हम रोज आते हैं

कुछ लोग जो नहीं रहे अब इस जहान में
मेरे ख्वाबों में मुझसे मिलने रोज आते हैं

है इंतज़ार जिन्हें, मेरी बर्बादी का ‘कोमल’
वही मेरी खैरियत लेने यहाँ रोज आते हैं.

बीती रात कुछ लोग मेरे घर आये थे

बीती रात कुछ लोग मेरे घर आये थे
साथ प्यार और जज़बात भी लाये थे||

होते थे कभी जो मेरे वतन का हिस्सा
हमसे मिलने पराये मुल्क से आये थे||

शक्ल-ओ-सूरत थे बिलकुल मेरे जैसे
गोया हमसे ही बिछडे हमसाये थे||

न कहा किसी ने कुछ न ही पूछा मुझसे
जाने किस मकसद से यहाँ आये थे||

गोलियों की आवाजों पे ख्याल आया हमें
खुदा जाने आतंकी थे या खौफज़दा साये थे||

सरहदें तो खेंच दीं हैवानों ने जमीन पर
मगर इंसानों के दिल कहाँ बाँट पाए थे||

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